Free Hindi Poem Quotes by Meera Soneji | 111733475

था एक अनजाना सा मुसाफिर आज अपना सा लगने लगा,
बढ़ाया उसने हाथ दोस्ती का जैसे डूबते को किनारा सा लगने लगा,
दी मुझे ख

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