Hindi Shayri by Saurabh Sangani

यूँही हम जकड़े हुए थे मन से ।
दिल ने दरवाज़े खोल दिए ॥

यूँही बेपरवाह बन गये थे गुस्ताखी से ।
अपने पन का जो बो

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