Hindi Shayri by Pravin Prajapati : 111566906

तक़दीर के पन्ने ख़ाली हैं,
और भरे हैं हाथ लकीरों से

टूटते है तो बहुत चुभते है
क्या कांच ? क्या ख्वाब ? क्या रिश्

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